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  • Writer's pictureCurious Observer

विदा

 
 
निस्तेज पड़ी है चारपाई पर, पल पल उसका बल निकले। मन में बस यही निराशा है, की प्राण कही न चल निकले। व्याकुल मन सबके होते हैं, निज हृदय में पीड़ा रहती हैं। मैं बोझ बनी निज प्रियजन पर, मेरे आज से पहले कल निकले।
जैसे ही श्वास विदा होते, पैरो से अतल वितल निकले। कुछ दिन का ही बस शोक है अब, जीवन भर अश्रु अटल निकले। अब लोग दूर से आयेंगे, उन्मादो को गहराएंगे। जब तक जीवित थी दुनिया में, उनकी पहले न शकल निकले।

— Curious Observer

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